शनिवार, 17 दिसंबर 2016

एक सैनिक की वो भावना जब वो घर जा रहा हो और अचानक उसकी छुट्टी कैंसिल हो जाए |

सैनिक की दास्तान –
हर चीजो का वो हिसाब सा लगा रहा था
जूते ले लिए , कपडे ले लिए ,बच्चो का सामान ले लिया
उनको झोले में रखकर वो कागज में निशान लगा रहा था
खुश हो भी क्यों न वो आखिर इतना
आज वो फौजी घर जो जा रहा था |
उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ना था जैसे
खुश तो ऐसा था जैसे कभी घर ना गया हो जैसे
उसके बच्चो का चहेरा बार बार उसके सामने आता है
हाथो में लेके वो अपनी घर जाने की टिकट
मन ही मन बहुत मुस्काता है |
पूरे साल भर हो गए उसे अपने घर गए हुए
वक्त कितना हो गया उस छोटे बच्चे को देखे हुए
उसकी बीवी उसके बच्चो के किस्से बताती है
छोटा वाला तो बोलना सीख रहा है , उसकी बीवी उसे रोज ये सुनाती है |
सपनो को आँखों में टिकट को हाथो में लेके
अचानक उसकी आँख सी लग जाती है
सुबह उठ के देखा तो हर तरफ एक हलचल नजर आती है |
अब हल्की सी उसके कानो में आवाज सी आती है
अब जाके हमले वाली खबर उसे समझ में आती है
सारे जवानों की छुट्टियां रद्द की जाती है
ऐसी खबर अचानक से पूरे देश में फ़ैल जाती है |
वो दिन आ गया जिसके लिए वो यहाँ आया था
बस पलट के उसकी नजर उस झोले में जाती है
देखा जो उसको तो आँखे उसकी भर आती है |
फिर भी अपने जज्बातों को संभाल कर वो बन्दूक उठाता है
अपने देश,अपनी माँ , अपने बच्चो के लिए
वो शरहद पे लड़ने चला जाता है |
उसके झोले में रखा हुआ सामान ना जाने उसे क्यों चिडाता है
तू एक फौजी है तुझे अब जंग में जाना है
वो उसे हर पल ये बताता है |
उसके बच्चो का चहेरा अचानक उसके सामने आ जाता है
पोंछ के आँखों के आंसू वो उस जीप में बैठ जाता है |
पापा कब आओगे घर उसके कानो में ये आवाज सी गूंजती है
कुछ सोच के बीच बीच में उसकी आँखे मुंद जाती है
कुछ बोले इससे पहले उसकी आवाज रुंध जाती है

उसकी आवाज रुंध जाती है ..........

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